धुंधलाती उम्मीदें

 

धुंधली सी एक चादर फैली थी,

भूरी सी, जैसे मिट्टी की सौगात।

बारिश बरस रही थी, शांत, धीमी,

खामोशी में घुली, एक अनकही बात।  


रास्ते पर कीचड़ के निशान,

उदासी की झलकें, सूखे पत्ते जैसे टूटे ख्वाब।

मैं खड़ा उस किनारे, नदी का किनारा,

देख रहा था उसकी मुस्कान, अनमनी, अधूरी बात।  


पानी में तैर रहे थे सपने,

धुंध के परदे में छिपी हुई यादें,

एक फुसफुसाहट, जैसे पुरानी कहानी,

जो फिर से सुनाना चाहती थी अपने ख्वाबों का जज़्बा।  


आसमान ऊपर, रंग थे उदास,

नीला गहरा, जैसे खामोशी का आसमां,

बादल धीरे-धीरे बह रहे थे,

छुपाए अपने राज़, जैसे जीवन का गहरा पैगाम।  


हवा में घुली थी नमी की खुशबू,

धरती की जागरूकता, सुबह का उजाला,

धीमे-धीमे धीमी हो गई रोशनी,

जैसे किसी की मुस्कान में हो जाती है झिझक।  


दुनिया शांत, एक कोमल आह में,

मुझसे पूछ रही थी—क्यों दिल भारी होते हैं,

क्यों दिन रुक जाते हैं, क्यों समय के साथ बहते हैं,

क्यों हमारी इच्छाएँ अधूरी रह जाती हैं।  


मैंने उन रास्तों का ख्याल किया, जो मैंने नहीं चुने,

उन सपनों को छोड़ा, जो कभी मेरे थे,

उस प्यार को, जो अब सिर्फ एक स्मृति है,

बारिश के नृत्य में खोए हुए ख्वाब जैसे परिंदा।  


धुंध मेरी कफ़न बन गई, मेरे विचारों का आकाश,

एक शांति का कोना, जहाँ मैं सोच सकता था—

उन बातों का, जो मैं कह नहीं सका,

उन दुखों का, जो कभी दूर नहीं होते।  


लेकिन नदी बहती रही,

उस भूरी चादर के नीचे, सूरज का पीछा करते हुए,

आशा की एक किरण, धुंधली सही, फिर भी चमकती,

वह सब कुछ आगे ले जाती रही—जीवन का नया सवेरा।

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