पहली दरार से पहले

 

गिरावट के बाद नहीं, बल्कि पहली दरार से पहले, जब वादे सोए हों और अनसुने रहते।

हमें पट्टियों का दिलासा नहीं, बल्कि नई उपजाऊ ज़मीन पर सुरक्षित क्षितिज की तलाश करनी चाहिए।

खोए हुए लोगों के लिए आँसू नहीं, बल्कि ऐसे कंधे चाहिए जो बोझ उठाकर बढ़ें।


शक्ति का राजदंड सुनहरे हाथों में रहता है, लेकिन सच बेकाबू हवा की तरह हमें परखता।

यह गलियों में फुसफुसाता है, पत्थरों से गूँजता है, लोगों की अपनी ज़मीन पर बीज बोता।

बस नियति का फैसला इंतज़ार करना, पल खोना है, और साथ ही अपने गर्व को भी।

जनता ही दबाव को संभाल सकती है, तोड़ सकती है, या आशीर्वाद दे सकती है भविष्य में।



शासकों को महान उद्देश्य से फरमान जारी करने दो, लेकिन तभी जब हम जागृत होकर मांग करें।

जागरूक आँख परछाइयों को चीरती है, साहसी आवाज़ अंतरात्मा को गहरी नींद से जगाती है।

खामोशी में हम मुरझा जाते हैं, हमारी आज़ादी खत्म होती है, बोलने में हम खिलते हैं।



लापरवाही पनपने पर कभी बख्शी नहीं जानी चाहिए, न ही खामोश रियायत या अनकही शिकायत।

एक सवाल आगे फेंको, आसमान में बिजली की तरह, न्याय खुले तौर पर मांगा जाता है।

हर छोटी दरार जिसे हम उजागर करने में असफल होते हैं, खाई बन सकती है भीतर।

वह हमारे जीवन के दिल को चोट पहुँचा सकती है, दुख की फसल बो सकती है।



तो अपनी नींद से उठो, जागो और आगे बढ़ो, मांग करो, बचाव करो, हर क्षण तक।

यह कर्तव्य हमारा है, पवित्र आदेश, न्यायपूर्ण भविष्य गढ़ने के लिए ताकि सभी आज़ाद हों।

फिर कोई झूठा चरवाहा, कोई नेता न सोए, जबकि वादे टूटें और नियति रोए।

हमारी खामोशी की कीमत, हमारी विनती का दाम, हमेशा अपराध की खामोशी में बदलता है।


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