नीले रत्न से प्रार्थना


धरती की बाहरी सीमाओं में,

रेगिस्तान फैलता है सपनों में।

फटी हुई मिट्टी आसमान थामे,

धूल की आँधी, प्राचीन नामे।

जहाँ कभी जीवन का था वास,

अब है मौन, और मृत्यु का साँस।


जब तुम नहीं रहोगे पास,

मर जाएगी मेरी हर साँस।

कविताएँ भी होंगी ख़ामोश,

शब्द बनेंगे बिन पंखों के कोश।

यादें नाज़ुक, काँच-सी टूटें,

शोक की हवाओं में छूटें।

हर पंक्ति, हर धड़कन बिखर जाएगी,

तुम गए तो रूह भी रो जाएगी।


ऊपर काले फ़रिश्ते उड़ते हैं,

हमारे पापों के साए गढ़ते हैं।

घोषित करते — सभ्यता महान,

पर धरती है पैरों के नीचे वीरान।

महिमा के भ्रम पर किले खड़े,

प्रगति के शोर में सब पड़े।

कल के बाग़ मुरझाए जाते,

लालच के बोझ तले दब जाते।


वे कारण हैं या बस गवाह,

पतन का लिखते नया इतिहास।

ज़हर बनी नदियाँ, टूटी किनारी,

काले योद्धा की ताक़त है भारी।

पर क्या वह बचा सकता है जीवन?

क्या तोड़ सकता है संदेह का बंधन?

क्या साहस की तलवार चमके,

और उदासीनता के पर्दे दमके?


ओ सौरमंडल के नीले रत्न,

तुम जो शून्य में करते हो चलन,

क्या देख रहे हो ये भूल हमारी?

काँटों में जलते सपनों की सवारी।

भोर डगमगाए, रात मुस्काए,

हमसे आशा कब तक छुपाए?


क्षितिज से मैं करता सवाल,

रेत मिले जहाँ आकाश विशाल।

प्रेम की आत्माएँ भटक रही,

सांत्वना की खोज में थक रही।

आशा यहाँ बस मृगतृष्णा,

कहानियों की अधूरी रचना।


सूरज जब धरती को धो देता,

तारों को रात में संजो देता,

क्या सुन पाते हो वह विलाप,

जो ब्रह्मांड का है धीमा आलाप?

रेगिस्तान की निस्तब्धता में,

तुम्हारी आवाज़ मिले प्रेमता में।

हँसी की गूँज, पुनर्जन्म का वादा,

अस्तित्व के धागों में सदा साधा।


तो मार्ग दिखाओ हे नीले रत्न,

जहाँ न हो कोई भय का बंधन।

जहाँ कवि साँस लें, गीत खिलें,

हर अंत में नई शुरुआत मिलें।

राख से उठे नया सवेरा,

जीवन कहे — मैं अब भी गहरा।


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