जीत का पहला क़दम
अँधेरा घना है तो क्या, कोई बात नहीं,
क्या कभी सूरज ने बिना रात के सुबह देखी है?
लहरें जब शोर मचाती हैं, तो क्या डरना?
क्या कभी समंदर ने बिना तूफान के अपनी गहराई परखी है?
जो डरता है हर रास्ते के पत्थर से,
वो मंज़िल तक पहुँचने का हौसला नहीं रखता।
जो भागता है अपनी परछाई से,
वो कभी खुद से मिलने का साहस नहीं रखता।
हर चोट, एक सबक है, हर ग़लती एक निशान,
जो तुम्हें बताता है कि तुम कहाँ थे, और कहाँ हो।
उठो! गिरो! फिर उठो! यह जीवन का खेल है,
जो तुम्हें सिखाता है कि तुम क्या थे, और क्या हो।
तो क्यों बैठे हो ख़ामोशी से, अपनी हार पर?
क्या तुम्हें नहीं पता कि तुम्हारी ताकत कहाँ है?
उस अँधेरे में ही, जहाँ तुम हारकर बैठे हो,
तुम्हारी जीत का पहला क़दम वहाँ है।
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