उड़ान का निमंत्रण


नील गगन में जो सत्य अमर है,

भीतर पंखों का बल प्रखर है।

धरती की खींच को छोड़ के जागो,

साहस से नभ का मार्ग सुहाओ।


भोर धुंधली हो, दृष्टि न डिगे,

तूफ़ान उठे, मन फिर भी जगे।

घोंसले की बात न सुनना तुम,

हृदय-ज्योति का आलोक चुनो।


हर पल तुमको विकल्प मिलेगा,

पथ अनजाना आगे खुलेगा।

अदृश्य पवन पर विश्वास रखो,

कथानक अपना इतिहास लिखो।


शंका के बंधन तोड़ उड़ो रे,

थकी डाल छोड़, गगन गहो रे।

दीपक वह जन्म से भीतर जलता,

किसी और की ज्योति न चलता।


माँ संग उड़ान न सदा रहेगी,

अवसर अपनी दिशा कहेगी।

दृष्टि, भूख, जीवन-ज्वाला लेकर,

अपना नभ तुम स्वयं गहोगे।


उड़ते रहो जब तक नभ न मिले,

तुम्हारे पंख जहाँ नभ को खिलें।

जिस प्रकाश की चाह जगाओ,

वह तो तुम्हारे भीतर ही पाओ।

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