कम में ही अधिक है

 मैंने यह शांत सच सीख लिया है: कम में ही अधिक है।

देवदार के पेड़ों की तरह, जो झुकते हैं पर टूटते नहीं।

मैंने एक आसान ज़िंदगी जीना सीख लिया है,

हर सुबह मैना के गीत से जागना,

और उन पुरानी इच्छाओं को छोड़ना।


अब मुझे पता है मुझे क्या चाहिए,

कोई सुनहरे सपने नहीं, बस शांति।

पहले मैं बेचैन झील की तरह था,

लगातार कुछ न कुछ चाहता रहता था।

पर अब मैं हर सुबह गौरैयों का गीत सुनता हूँ,

और उनकी सादगी से सीखता हूँ।


मधुमक्खी मुझे सिखाती है, कि जितना ज़रूरी है उतना ही लो।

कोई दौड़ नहीं, कोई लालच नहीं।

अब मैं समझ गया हूँ कि असली आज़ादी क्या है-

वो, जब तुम अपनी सारी इच्छाओं को पीछे छोड़ देते हो।


मैं पेड़ों की तरह अपनी चाहत छोड़ देता हूँ,

बस अपनी ज़रूरत पर ध्यान देता हूँ।

गौरैया को दाना और आसमान ही काफी हैं,

उनके गीत को पूरा करने के लिए।

मेरी आत्मा अब शांत है, लालच से मुक्त है।


सुबह की पहली किरण मुझे सिखाती है,

कि सुंदरता को शोर की ज़रूरत नहीं।

यह बस सूरज और हवा से भी खिल सकती है।

मैंने बेचैनियों को टूटने दिया है,

ताकि मेरी आत्मा अपनी आवाज़ पा सके।


अब मैं बस वही रखता हूँ जो मुझे चाहिए,

न कि भारी सोना या खत्म न होने वाली इच्छाएँ।

मैं धीरे-धीरे इस अंदर की कला में जी रहा हूँ,

जिसमें होने का आनंद ही सब कुछ है।

अब मैं उस पेड़ के नीचे बैठा हूँ,

एक साँस, एक बीज, और मुझमें एक गीत-

यही शांत कला है, कि कम में ही अधिक है।

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