साझा साहस
छाया उतरी, ठंडी, सूनी हवा चली,
फुसफुसाहट ने चुप पेड़ों को छू ली।
मन के भीतर कैद एक मौन डर,
रात-दर-रात उसे ही निगलता सफ़र।
हमने किले बनाए ऊँचे, भारी, कठोर,
पत्थरों में बांध दिए उजाले के छोर।
हर भय को दूर करने की थी पुकार,
कुछ थामने की चाह, कुछ अपना विचार।
नायक गिरे, पुरानी कथाएँ हुईं ठंडी,
कमज़ोर ढाल-सी, कहानी रही मंदी।
जीवन तो बस एक सांस, क्षणिक अहसास,
अनंत गगन के नीचे, नगण्य प्रकाश।
पर उन दीवारों पर, जो अकेली खड़ी थीं,
एक और तरह की रोशनी पड़ी थी।
सूरज से नहीं, पर एक कोमल मुख से,
थकान में सुकून, आँखों के सुख से।
किला टूटा, सन्नाटा भी घुलने लगा,
भय मिटा, साथ का साहस खुलने लगा।
जब हमने भय की आँखों में देखा,
प्यार ने साहस को सच में सींचा।
कहानियाँ झूठी नहीं, जोड़ने के लिए हैं,
घाव भरने, दिलों को सीने के लिए हैं।
यह ब्रह्मनृत्य अकेला, निर्दयी नहीं,
बल्कि साझा सफ़र है, इस धरती पर कहीं।
तो आओ खड़े हों आँखें खोल कर,
विदाई में भी ताक़त ढूँढ कर।
भय की पकड़ सच में ढलने लगे,
इस जुड़े हुए, बहादुर जग में जगे।
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