जो कभी ना बुझी वो ज्वाला
भारत के स्वतंत्रता दिवस पर एक कविता
संतों की धूनी, वेदों का गीत,
उठी थी भारत की पुकार अतीत।
ना तलवारों से, ना ताज से बनी,
सच की आग से यह आत्मा जगी।
वो चली धधकती राहों में,
गिरी नहीं इतिहास की आंधी में।
आए लुटेरे, लेकर लालच और बल,
पर छू न सके उसका भीतर का जल।
एक किसान झुका, मगर टूटा नहीं,
उसके कांधों पर भारत खड़ा वहीं।
एक माँ की आँखों में आँसू थे,
पर गंगा सी शक्ति भी उनमें बसे।
बिके थे बेटे, जलाए गए,
पर आत्मा की ज्वाला बुझाए न गए।
ना महलों में, ना बाज़ारों में,
वो बसी थी साधना के संध्या तारों में।
गीता का संदेश, बुद्ध का ध्यान,
भक्तों का नृत्य, कवियों का गान —
हर श्वास में यही गूंजता है,
"डर छोड़ो, सत्य में डट जाओ" यही कहता है।
जब ज़ंजीरों में नाम लिखा गया,
भारत ने उत्तर मौन से दिया।
वो फिर उठी, अग्नि सी शांत,
हर नज़र में सूरज का तेज़ प्रचंड।
ना शासन की लालसा, ना विजय का मोह,
बस आत्मा की स्वतंत्रता ही उसका जोश।
ना केवल भूमि, ना केवल जात —
भारत है चेतना की बात।
अब गूंज रही है आज़ादी की तान,
हर खेत, हर घाट, हर धड़कन में जान।
यह स्वाधीनता केवल दिन नहीं,
ये भय और घृणा का अंत भी है कहीं।
तो फिर उठो, ओ आत्मा के देश,
ना केवल तिरंगे, ना केवल वेश।
तू वो अग्नि है जो बुझती नहीं —
अंधियारे में भी जो जलती रही।\*\*

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